क्यों होती है कुमारी पूजा? किस वर्ष की कुमारी किस नाम से पूजी जाती हैं?

23/10/2020,11:48:50 AM.

 

कोलकाता: बंगाव में लोगों को दुर्गापूजा का बड़ी बेशब्री से इंतजार रहता है। अब यह त्योहार शुरू हो चुका है। आज महासप्तमी है। वैसे तो इस पूजा में कई धार्मिक कर्मकांड विधिवत किया जाते हैं। लेकिन बंगाल के दुर्गापूजा में कुमारी पूजा का अहम धार्मिक मान्यता है।

बंगाल में कई स्थानों पर विधिवत कुमारी पूजा की जाती है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी, ये तीन दिन या किसी एक दिन कुमारी पूजा का आयोजन किया जा सकता है। हालांकि अधिकांश जगहों पर अष्टमी और नौवमी को ही मुख्यरूप से कुमारी पूजा की जाती है। इस पूजा में एक साल से सोलह साल (मासिक धर्म ना होने तक) की बालिकाओं को कुमारी के रूप में पूजा जा सकता है।

प्रत्येक आयु की बालिकाएं मां के अलग-अलग नामों से पूजी जाती हैं। एक साल की बालिका को संध्या, दो साल की बालिका को सरस्वती, तीन साल की बालिका को त्रिधा, चार साल की बालिका को कालिका, पांच साल की बालिका को सुभगा, छह साल की बालिका को ऊमा, सात साल की बालिका को मालिनी….. इस प्रकार से अन्य आयु की बालिकाओं को अन्य नामों से पूजा जाता है।

इस पूजा में चंदन, कुमकुम समेत अन्य पूजन सामाग्रियों का विधिवत उपयोग किया जाता है। पूजा से पहले बालिका को अच्छे तरीके से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें नया कपड़ा पहनाया जाता है। पैरों में अलता व अन्य पूजन सामग्रियों से बालिका को देवी की रूप दी जाती है। तत्पश्चत बालिका को देवी स्थाल पर विभिन्न मंत्रोच्चारण के बीच स्थापित किया जाता है और इस प्रकार से पारंपरिक कुमारी पूजा का शुभारंभ हो जाता है। श्रद्धालु कुमारी में मां के स्वरुप की अनुभूति करते हैं। कुमारी पूजा का विशेषकर बंगाल में बड़ा घार्मिक महत्व होता है।

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