कविता-जो ये तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट है

24/07/2020,10:09:09 PM.

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25-07-2020

जो ये तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट है
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जो ये तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट है
कहां से लाती हो
नहीं, मैं नहीं मांगूगा तुमसे
मेरे रगों में भी है
मनुष्यता का यह डीएनए

जो ये हर बार उभर आती है
मेरे रक्त में बहती पीड़ा
मैं कैसे छिपाऊं
कहां से लाऊं
बिकती है क्या कहीं
सुख की कोई पुड़िया

पता है क्या तुम्हें
किस शहर के
किस दुकान, किस बाजार, किस मॉल में
बिकती है सुख की पुड़िया

 

 


26-07-2020

 

अब गांव में मिल-बैठ नहीं रोती औरतें
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अब वह नहीं दिखती तस्वीर
गांव में जो दिखती थी पहले

जब-जब हम गांव जाते
देखते थे हम हमेशा
मां संग मिल-बैठ
रोतीं काकी बुआ बड़की मां

जब आती
रिश्ते की और कोई महिला
फिर मिल-बैठ रोती एक-एककर

जब मैं हो रहा था बड़ा
और बड़े होने के कई साल बाद तक
मन में आता रहता
कि क्यों रोती हैं मिल-बैठ
गांव की औरतें

अब गांव में मिल-बैठ नहीं रोती औरतें
कि धीरे-धीरे खुलने लगीं परतें
समझ में आने लगा
क्यों रोती हैं मिल-बैठ गांव की औरतें

दुख, हां ढेर सारा दुख
होता गया उनके आंचल में जमा
पति बच्चे नाते रिश्ते
के लिए चौका-चूल्हा
जी-तोड़ बिना थके परिश्रम
अपनों का अपमान अवेहलना लांक्षना
रतजगे में भोगी पीड़ा
परिवार खींचने की चक्की में
पीस-पीस कर घिसना
कोलाहल में भी अकेलेपन का दंश

दर्द की और-और अनचिन्हे दास्तानें
बदन में टिसते अनदेखे घाव
मरहम का आस नहीं
इंतजार की लंबी रातें

कि अब गांव में मिल-बैठ नहीं रोती औरतें
कि रित हुई यह पराई
अब दुख भी नहीं झरता आंचल से
सुख साधन
बहे जा रहे गांव की पगडंडियों में

अब आंचल में बंधे हैं अभिमान
आंसुओं को आंखों में ही रोकना
बन गई है बड़ी कला

अब दूर नहीं कोई
टावर दिखते हैं गांव-गांव
मोबाइल पर होती रहती है बात
नहीं तो व्हाट्सऐप पर होती है चैट
या आता वीडियो कॉल
और नहीं तो फेसबुक पर होता दुआ-सलाम
सब है पास-पास

गांव में आ बसा है शहर
शहर में है सब सुंदर-सुंदर
सुंदर-सुंदर है सबका जीवन

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